Wednesday, May 4, 2011

बचपन की स्मृतियाँ

आज अपने घर के आँगन  की याद आती है
टाफियाँ खाओ तो   बचपन की याद आती है.

फुरसत निकाल,  कागज की नाव ही बनालें

आज फिर शरारती  सावन की याद आती है.

हो के सयाने साथी सब,  छूटे  हैं,    बिछड़े हैं

रेल के उन डिब्बों -    इंजन की याद आती है.

कंचे की गोली  , वो लट्टू   ,वो चकरी  - पतंग

अल्हड़ - से धूल सने , तन की याद आती है .

बसते में स्लेट-कलमअधफटी किताबें कुछ

शाला की घंटी , टन  -  टन की याद आती है.

हर     मौसम    घूमते   ,  नंगे - अधनंगे   से

कमर काली डोर के,करधन की याद आती है .

उकताये  बैठे  हैं , सब  सुख - सुविधा पाकर

एक चूल्हा - चौका - बासन की याद आती है.

जीना है  -  ,खाते हैं   , भूख  कहाँ  लगती  है

आज फिर मिट्टी के बरतन की याद आती है.

दाम्पत्य - जीवन  में ,  जब तनाव आता है

मिट्टी  के दूल्हा - दुल्हन की  याद  आती  है . 
 
- अरुण कुमार निगम
  १०५,शंभू श्री अपार्टमेन्ट
  अहिंसा चौक ,विजय नगर
  जबलपुर    ( म.प्र.)

5 comments:

  1. प्यारी मासूम .... मनमोहक रचना ....जीवन हर मोड़ पर साथ चलता है बचपन ...और उससे जुड़ी स्मृतियाँ.....

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  2. हृदयस्पर्शी प्रस्तुति!

    अरुण जी, ये बचपन की यादें ही तो हैं जो मृत्युपर्यन्त साथ देती हैं!

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  3. हमें तो सबकी, बड़ी याद आती है।

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  4. bachapan ki yadon ko jeevant kar diyaa aapane. achchha likhate hain aap bhi shubhkamanae..

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